Saturday 24 January 2009
Sunday 21 September 2008
यूँ लगा जब...
बुनती-उधडती ज़िन्दगी में मुझे एक नए एहसास ने छुआ। यह एहसास था आम से खास बन जाने का। दिन था ५ सितम्बर यानि टीचर्स डे...सुबह करीब१० बजे जब मैं क्लास में गया तो स्टूडेंट्स ने जिस गर्मजोशी से विश किया वो कुछ खास था...उसके बाद हर क्लास में कमोबेश यही हल था तब मुझे इस बात का एहसास हुआ की दिन नही लोगो की वजह से आप आम से खास हो जाते हैं...शाम को जब मैं तमाम गिफ्ट के साथ घर पंहुचा तो मैं बहुत खुश था...खाना खाने के बाद जब मैं खास होने के एहसास को एन्जॉय कर रहा था की मुझे मेरे ज़मीर ने आवाज़ दी जैसे कह रहा हो नवाज़ खास तुम नही खास वो है जिन्होंने तुम्हे इस एहसास से रूबरू किया इस सच्चाई को समझते ही मेरे पैर बिस्तर पर और मुस्कान चेहरे पर फैल गई...इस एहसास से मैं खुश था बहुत खुश। मैं जान चुका था की खास तो मेरे स्टुडेंट हैं जो मुझ जैसे आम इंसान को खास होने का एहसास करते है। इस मौके पर मुझे जावेद अख्तर साहब के कलाम की एक किताब भी मिली उसी के चंद अशार पेश कर रहा हूँ ...
'मैं ख़ुद भी सोचता हूँ की क्या मेरा हाल है
जिसका जवाब चाहिए वो क्या सवाल है '
'मैं ख़ुद भी सोचता हूँ की क्या मेरा हाल है
जिसका जवाब चाहिए वो क्या सवाल है '
ऐ सफर इतना राऐगा तो न जा
न हो मंजिल कहीं तो पहुँचा दे
आप सब भी अपनी मंजिल तक पहुंचे यही मेरी दुआ है ।
Tuesday 22 July 2008
जिंदगी की जद्दोजहद
जिंदगी की जद्दो जहद, एक मुकाम पाने की हसरत, नाकामयाबियों का डर इन सभी मुश्किलों पर काबू पाया जा सकता है बशर्ते हमारी हौसलाफजाई की जाऐ, हमारे अपने हमारे साथ हो वो अपने जिन्हें हम रिश्तो की नाज़ुक डोर मे बाँध के रखते हैं और उनसे इतनी उम्मीदें बाँध लेते है की जब उन उम्मीदों की नींव दरकती है तो पूरा आशियाँ एक खामोश शोर के साथ ढेर हो जाता है उम्मीदों के इस मलबे मे जब हम खुशियाँ तलाशते है तो हाथ लगते है करीने से सजाए गए यादों के कुछ बोसीदा से टुकड़े जिनमे इतना माद्दा तो रहता है की वो आँखों में नमी और चेहरे पर तंज़ भरी मुस्कराहट की लकीर खीच सकें और तब इन्सान के लिए दोबारा जिंदगी समेट पाना बेहद मुश्किल हो जाता है दो ही रस्ते बचते हैं या तो नई शुरुआत करें या फिर पुराने रिश्तो को एक मौका और दे आप ही बताएं आपको क्या लगता है ?
Friday 9 May 2008
Tuesday 15 April 2008
Tuesday 25 March 2008
रेत सी फिसलती ज़िंदगी...
आज न जाने क्यों फिर लगा की ज़िंदगी रेत की तरह हाथो से फिसल रही है ...शायद इसलिए की वक्त करवट लेता है जो था वह आज नही, जो है वह कल नही रहेगा यही सिलसिला चलता रहता है तो फिर क्यों हम ज़िंदगी मैं हर हालात को काबू करने की बेवजह कोशिश करते रहते है फिर ये ख्याल आता है की कोई तो मकसद हो जो जेने की वजह दे सके फिसलती ज़िंदगी को हिम्मत से समेटना भी तो एक मकसद हो सकता है, मैंने तो हिम्मत बटोर कर ख़ुद तो दोबारा जोड़ कर फिर से लड़ने के लिए तैयार कर लिया है और अपने ...
Subscribe to:
Posts (Atom)

